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		<title>Sujangarh Map</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Jul 2011 07:34:39 +0000</pubDate>
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		<title>Hello world!</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Jul 2011 13:54:17 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[Welcome to WordPress. This is your first post. Edit or delete it, then start blogging!]]></description>
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		<title>सुजानगढ़ का परिचय</title>
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		<pubDate>Fri, 08 Jul 2011 13:54:17 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[राजस्थान के चुरू जिले में मुख्यालय का दर्जा प्राप्त सुजानगढ़ है तो क़स्बा परन्तु इसमें कसबे जेसी कोई चीज़ नही है वर्तमान में सुजानगढ़ सभी साधनों से युक्त एक अच्छा नगर या शहर जेसा ही लगता है । कोरवों-पांडवों के &#8230; <a href="http://www.mysujangarh.com/intro/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>राजस्थान के चुरू जिले में मुख्यालय का दर्जा प्राप्त सुजानगढ़ है तो क़स्बा परन्तु इसमें कसबे जेसी कोई चीज़ नही है वर्तमान में सुजानगढ़ सभी साधनों से युक्त एक अच्छा नगर या शहर जेसा ही लगता है । कोरवों-पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की तपोस्थली द्रोंनपुर और बाद के शिशुपाल की राजधानी चन्द्री के कारन प्रसिद्ध सुजानगढ़ क्षेत्र का एक एक पत्थर अनेक गाथाएं कहता प्रतीत होता है । सुजानगढ़ का इतिहास पांच सौ बरसों से भी पुराना है १७७३ में सांडवा के बिदावत ठाकुर भोमसिंह ने सुजानगढ़ के किले का निर्माण करवाया । राव जोधा के गुरु हरबुजी सांखला के नाम पर &#8216;हरबुजी रो कोट&#8217; नाम से इसका नाम पड़ा । पुराने लोगो का मत है की भोमसिंह ने इसे भोमपुरा नामे भी दिया । लम्बे समय तक सुजानगढ़ हरबुजी रो कोट नाम से जाना जाता रहा । बाद में बोलने की सरलता से इसका नाम &#8216;खरबुजी कोट&#8217; प्रचलित हो गया । यह नाम सूरज सिंह  के समय तक प्रचालन में रहा । सूरज सिंह ने अपने राज्यकाल में बिदावतों के विद्रोह को दबाने के लिए सांडवा ठाकुर भोमसिंह के ठिकाने को अधिकार में लेकर सुजानगढ़ को थाने का रूप दे दिया और भोमपुरा से इसका नामांकरण बीकानेर के 12  वें महाराजा सुजानसिंह की स्मर्ति में सुजानगढ़ रखा गया, ऐसा मन जाता है की एक ऐसा ही उल्लेख मुंशी सोहन लाल की एतिहासिक कर्ति &#8220;तवारीख राज श्री बीकानेर &#8221; में भी उद्दत है । उन्नीसवी सदी के अंत में तथा बीसवी शादी के शुरू में सुजानगढ़ छेत्र के  धनाडय लोगों ने समाज कल्याण के अनेक कार्यों के तहे दिल से बढ़ चढ़ कर भाग लिया ।</p>
<p>सन् 1943 में जोरावरमल जालान ने कस्बे में स्टेट गर्ल्स मिडिल स्कूल के भवन का निर्माण करवाया । वहीँ 1940  में प्रतापमल, रंगलाल व गंगाधर बगड़िया ने हाई स्कूल का निर्माण करवा कर सर्कार को दिया । 1913  में मिश्रीलाल जैन ने विधा प्रचारिणी सभा की भी स्थापना की जो अपने समय में शिक्षा में पहल कही जा सकती है ।</p>
<p>दानमल चौपड़ा ने 1931 में पुस्तकालय बनवाया वहीँ 1935  में सेठ बिरधिचंद सेठिया व सेठ रामदेव सारडा ने दातव्य औषधालय की स्थापना कर क्षेत्र को विकास की राह दिखाई । 1937  में सुजानगढ़ के दिगम्बर जैन मित्र मंडल पुस्तकालय  स्थापना तथा कस्बे के बुद्धिजीवियों ने 1940  में कस्बे में &#8220;राजस्थानी साहित्य सदन&#8217; की स्थापना की । दान-पुन्य और जन कल्याणकारी कार्यों के बाद की पीढ़ी का योगदान भी कम उल्लेखनीय नही है । बाद के वर्षो में भी यहाँ अनेक जन कल्याणकारी  संस्थाओ की स्थापना तिर्व गति से हुई । पुरे संभाग के एक सुजानगढ़ ही वह क़स्बा है जहाँ सार्वजनिक उपयोग  के और धार्मिक महत्व के भवनों का उल्लेखनीय निर्माण हुआ ।</p>
<p>भारत की स्वतन्त्रता में भी सुजानगढ़ की भूमिका कम नही रही । सन् 1927 के पश्चात् राजस्थान के सभी हलको की भांति सुजानगढ़ क्षेत्र में सभी स्वतन्त्रता की भावनाएँ हिलौरे लगने लगी । शंकरदान सामौर जैसे कवियों ने अंग्रेजो के खिलाफ काव्य रचनाएँ की तो डूंगरजी जवाहरजी जैसे वीरों ने अंग्रेजों के खिलाफ एक वातावरण तैयार कर जन मानस को जोड़ा । प्रजा-परिषद के ज़माने में भी उपरोक्त स्वतन्त्रता चेतना पृष्ठ-भूमि की कारगर भूमिका रही है । सुजानगढ़ के लोगों ने सन् 1942  में मारवाड़ लोक परिषद् के अधिवेशन में खुलकर भागेदारी निभाई । पं. गिरीश चन्द्र मिश्र उस समय सुजानगढ़ में क्रांतिकारियों के अगुवा थे जो उस समय के सभी बड़े क्रांतिकारियों के सामिप्य रखते थे ।</p>
<p>सांगीतिक एंव साहित्यिक प्रतिभाओ के क्षेत्र में सुजानगढ़ सदा धनी व अग्रणी रहा है । संगीत, नृत्य व अन्यान्य कलाओ &#8211; विधाओ में इस क्षेत्र की प्रतिभाओ को विश्व स्तरीय ख्याति प्राप्त है । यह ख्याति आज भी बढ़ रही है । राजस्थानी भाषा व साहित्य के विकास एंव संवर्धन में सुजानगढ़ का प्रारम्भ से ही उत्कृष्ट योगदान रहा है । यहाँ के कवि कन्हैयालाल सेठिया ने राजस्थानी साहित्य के श्रीयश में महती वृद्धि की । उनका लिखा गीत &#8216;धरती धोराँ री&#8230;&#8217; राजस्थान का राज्य &#8211; गीत सा हर तरफ गुंजायमान रहता है । सुजानगढ़ क्षेत्र को कत्थक &#8211; नृत्य की जन्म सथ्ली भी कहा जाता है । संगीत के शिखर पर सुजानगढ़ की प्रतिभाएँ प्रशंसनीय योगदान कर चुकी है । सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के गुरु टी. खेमचंद परकाश भी इसी  क्षेत्र की देन है । लता मंगेशकर के गुरु व अमर फिल्म &#8216;महल&#8217; के संगीतकार स्व. टी. खेमचंद प्रकाश एंव साहित्य में &#8216;धरती धोराँ री&#8217; व &#8216;पाथल &#8211; पीथल&#8217; जैसी अमर रचनाओ के यशस्वी साहित्यकार श्री कन्हैयालाल सेठिया को इस क्षेत्र की अगर्गन्य प्रतिभाओं की संज्ञा दी जा सकती है ।स्व. जमाल सैन ने इस कड़ी को आगे बढाया । स्व. जमाल सैन ने फिल्म &#8216;शोखियां&#8217;, &#8216;दायरा&#8217;, &#8216;रंगीला&#8217;, &#8216;धर्मपत्नी&#8217;, &#8216;अमर शहीद&#8217;, &#8216;नथ का मोती&#8217;, &#8216;मधुमक्खी&#8217;, &#8216;मनचली&#8217; जैसी प्रख्यात फिल्मो में संगीत निर्देशन किया । स्व. जमाल सैन के बाद की तीन पीढीयाँ भी संगीत क्षेत्र में सक्रिय है ।जमाल सैन के पुत्र शंभु सैन फ़िल्मी दुनिया में पंच मुखी कलाकार के रूप में जाने जाते थे संभु सैन के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म &#8216;मृगतृष्णा&#8217; व राजस्थानी फिल्म &#8216;लाड़ों&#8217;, &#8216;थ्हारी &#8211; म्हारी&#8217;, &#8216;जेठ &#8211; जेठानी&#8217;, &#8216;भाई &#8211; भोजाई&#8217; , चर्चित रही ।वर्तमान में हिंदी फिल्मो के आकाश पर संभु सैन के पुत्र समीर एंव भाई दिलीप बतोर संगीतकार &#8216;दिलीप सैन &#8211; समीर सैन&#8217; के रूप में छाए हुए हैं ।</p>
<p>सुजानगढ़ के दिलीप सैन &#8211; समीर सैन उन संगीतकारों में से है जिन्होंने अपने हुनर के दम पर जल्द ही सिने जगत प्रेमियों के दिलो में अपना स्थान बना, कुछ ही अर्से में बुलंदियों को छू लिया । सुजानगढ़ की इस युगल कलाकारों की जोड़ी ने फिल्म &#8216;सुरमा &#8211; भोपाली&#8217; से अपना कैरियर शुरू कर, वर्तमान में &#8216;अंधेरगर्दी&#8217;, &#8216;युद्धपथ&#8217;, &#8216;आग&#8217;,'आइना&#8217;, &#8216;मेहरबान&#8217;, &#8216;युग&#8217;, &#8216;खून का सिंदूर&#8217;, &#8216;जीना मरना तेरे संग&#8217;, &#8216;कर्तव्य&#8217;, &#8216;जुलम की हुकुमत&#8217;, &#8216;प्रहरी&#8217;, &#8216;तू चोर में सिपाही&#8217;, &#8216;आशिक मस्ताने&#8217;,'हकीकत&#8217;, &#8216;जुर्माना&#8217;, &#8216;आए दिन प्यार के&#8217;, &#8216;इश्क खुदा है&#8217;, &#8216;उम्र पचपन की दिल बचपन का&#8217;, जैसी दर्जनों प्रसिद्ध हिंदी फिल्मो में संगीत निर्देशन का कार्य संभाले हुए है । इसके अलावा स्व. बिहारी कथक, नृत्याचार्य पं. गोरीशंकर, बाबूलाल कथक, पं. चांद गिरधर चांद, तेज प्रकाश &#8216;तुलसी&#8217;, रुकनुदीन खां, फ़तेह सिंह गंगाणी, स्व. पं.जगनाथ प्रसाद, संगीतकार त्रिवेणी-भवानी ,कत्थक गुरु राजेन्द्र गंगाणी, बी. सोहनलाल, गीतकार &#8211; पी. के. मिश्रा, मदन महाराज, स्व. गिरीश मिश्र, राम शंकर इत्यादी सुजानगढ़ की गोरवशाली प्रतिभाएँ हैं, जिन्होंने इस कस्बे की ख्याति को विश्व स्तर पर प्रतिस्थापित किया है । क्षेत्र के जाने-मने उधोगपति डॉ. सी. आर. भंसाली, राजेन्द्र सेठिया, व राजनीति में स्व. फूलचंद जैन काफी चर्चित रहे ।</p>
<p>सुजानगढ़ के बगड़िया परिवार ने सुजानगढ़ में सर्वाधिक सार्वजानिक निर्माण कार्य करवाए ।इस अकेले बगड़िया परिवार ने ही सुजानगढ़ का रेलवे स्टेशन प्रतीक्षालय, पूनमचंद बागडिया सी.हा. सै. स्कुल, बगड़िया संस्कृत विद्यालय, भव्य धंराधर, बगड़िया &#8216;अ&#8217; श्रेणी राजकीय चिकित्सालय, &#8216;अ&#8217; श्रेणी आयुर्वेदिक चिकित्सालय  समेत कई धर्मशालाओ का लोक हितार्थ निर्माण कर क्षेत्र के विकास में काफी सराहनीय भूमिका निभाई है । अब भी यह परिवार विभिन निर्माण कार्यों के लिए तत्पर है । सुजानगढ़ कस्बे व तहसील के समीपस्थ गांवों में भी बगड़िया परिवार ने कई धर्मशालाएं व विधालय भवनों का निर्माण करवाया इतिहास के पृष्ठों में एंव पुराने वक्तियों से उदारमना सेठ स्व पन्ने चाँद सिन्धी की दान गाथाओं के चर्चे बहुत ज्यादा पढने व सुनने में आते ह सेठ पन्नेचंद सिन्धी की उदार भावनाओं स्वरूप अख्तियार कर चुके है । यानि शुरू के लेकर वर्तमान तक सुजानगढ़ में सेठों व धनाढय वक्तियों का निर्माण कार्यों एवं अन्य गतिविधियों में प्रशसनीय योगदान रहा ।</p>
<p>सुजानगढ़ आजादी से पूर्व बीकानेर राज्य में जिला था । उस समय बीकानेर राज्यान्तर्गत राज्य चार जिले थे, सुजानगढ़ राजगड गंगानगर और बीकानेर । लेकिन सन्  1947 में सुजानगढ़ जिले की मान्यता रद्द कर दी गयी । 27  अगस्त , 1947  में सुजानगढ़ की उप-खंड मान्यता भी छीन ली गयी । आज सुजानगढ़ को पुन: जिला बन्ने की मांग तेजी से जोर पकड़ रही है पुराकाल से सुजानगढ़ में शिल्प कला व स्थापत्य कला के साथ मंदिरों एंव प्राचीन स्मारकों की चर्चे पुराने ज़माने में तो दूर दूर तक थे । कस्बे के मध्य विशाल परिसर में युगों से खड़ा सिंघी मंदिर समूचे बीकानेर राज्य में प्रसिद्ध रहा था तत्कालीन प्रकाशित सभी गजटों में इसकी भव्यता का उल्लेख किया गया उत्राभिमुख सिन्धी मंदिर का पूरा नाम श्री देव सागर सिन्धी जैन मंदिर है । कांच की जड़ाई एंव स्थापत्यकला की दृष्टी से चर्चित इस मंदिर के सम्बन्ध में कई किवन्दन्तियाँ प्रचलित है । इस क्षेत्र में आने वाले लोग बड़े चाव से इस मंदिर के दर्शन करते है । बीकानेर राज्य के तत्कालीन महाराजा गंगासिंह जी ने भारत के वाइसराय को यह मंदिर दिखाया तो वे इसकी कारीगरी तथा स्थापत्य देखकर चकित को गये । जैन धर्म के तेइसवें तीर्थकर भगवन- श्री पाशर्वनाथ स्वामी का यह मंदिर सुजानगढ़ के प्रतीस्ठित व्यवसायी और राज्य सत्ता में महत्वपूर्ण सम्मान रखने वाले एक जैन धर्मावलम्बी सिन्धी परिवार की अथक लगन, परिश्रम व धन व्यय के परिणाम स्वरूप निर्मित हुआ । इसके निर्माण में काफी वक्त लगा । </p>
<p>सुजानगढ़ के रेलवे स्टेशन का मुख्य बस स्टैंड के एकदम नजदीक बना भव्य वेंकटेश्वर मंदिर प्रत्येक पर्यटक और यात्री को आकर्षित करता है । विशाल क्षेत्र में बने वेंकटेश्वर मनीर की रंग बिरंगी मूर्तियाँ कई किलोमीटर दूर से ही दिखाई पद जाती है वेंकटेश्वर निर्माण फलस्वरूप सुजानगढ़ की दर्शनीय एवं आध्यात्मिक छवि में वृद्धि हुई है । दक्षिण भारत में तिरुपति में स्थित वेंकटेश्वर भगवन का मंदिर सम्पूर्ण भारत में अपनी भव्यता के कारन प्रसिद्ध रहा है । लगभग उसी आधार पर निर्मित यह मंदिर उतरी भारत में एकमात्र है । मंदिर के स्थापत्य एवं मूर्ति शिल्प में दक्षिण भारतीय रंग स्पष्ट द्रष्टिगोचर होता है । मंदिर में पुजारी भी दक्षिण भारतीय है एवं दाख्सिं भारतीय भाषा व संस्कृति में आरती समेत सभी धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होते है इसी के साथ धार्मिक आस्था का केंद्र श्री सालासर बालाजी का मंदिर सांस्कृतिक वैभव समेटे डूंगर बालाजी एंव स्यानण जैसे धार्मिक स्थल पर्यटन की द्रष्टि से भी काफी उपयोक्त है । सालासर बालाजी धाम में प्रतिवर्ष लाखो की संख्या में भक्तगण भारत के दूर दराज के राज्यों से आते है । सुजानगढ़ से 2 किलोमीटर दूर एतिहासिक ठरडा का रामदेव बाबा मंदिर, सुजानगढ़ के भीतर स्थित रामचन्द्रजी का मंदिर, श्री दिगम्बर जैन मंदिर , मालासी भैरव मंदिर, रुपयों वाला मंदिर इत्यादि अन्य धार्मिक स्थल भी सुजानगढ़ पुराकालीन महता की कहानी अपनी जुबानी कहते नजर आते है जैन नसिया मंदिर में दिगम्बर जैन समुदाय के सभी तीर्थकरों की भव्य मूर्तियाँ लगी है, जो दर्शन करने वालो को आध्यात्मक के आनन्द से सराबोर कर देती है । सुजानगढ़ तहसील में एशिया का सबसे बड़ा कृष्ण मृग अभयारण्य ताल छापर भी इतिहास के पन्नो में अपनी उपस्तिथि दिखता है । ताल छापर के इस अभ्यारण्य में मोसमानुसार विदेशी पक्षी भी प्रतिवर्ष भारी तादाद में आते है ।सुजानगढ़ क्षेत्र में अरावली पर्वत श्रंखला की कई पहाड़ियां है ।</p>
<p>सुजानगढ़ में कार्यरत अनेक सामाजिक संस्थाओं ने भी सुजानगढ़ के विकास व संवर्धन में काफी भूमिका निभाई है। समय-समय पर इन्ही संस्थाओं ने सक्रिय होकर क्षेत्र में शिक्षा,कला,संगीत एंव संस्कृति की जोत जलाई ।आज से पच्चीस वर्ष पूर्व नगर में कार्यरत युवाओ की जागरूक सामाजिक संस्था &#8221;दी यंग्स क्लब ऑफ़ सुजानगढ़&#8221; को वर्तमान में क्षेत्र की अग्रणी सामाजिक संस्था का दर्जा दिया जा सकता है ।दी यंग्स क्लब का अपना स्वयं का एक विशाल भवन व सभागार है ।सभागार में अकादमी के सहयोग से व व्यक्तिगत तोर पर राष्ट्रीय एंव अंतराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम निरंतर आयोजित होते रहे है । साथ ही प्रवासी नागरिको हेतु यंग्स क्लब &#8216;प्रतिबिम्ब&#8217; नाम से दो मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन करती है  ।सुजानगढ़ में प्राय: संस्थाओ द्वारा विभिन्न रोगों के विरुद्ध चिकित्सा शिविर आयोजित होते रहते है । इनके साथ ही &#8216;राष्ट्रीय क्लब संस्थान&#8217; जन सेवा समिति, नगर श्री, बेडन पावेल संस्थान, जन चेतना परिषद् , संगिर श्री संस्थान, भारतीय सेवा समिति, उपभोक्ता सरंक्षण समिति, जुगल खेल संस्थान , नया बस क्लब , सुजानगढ़ नागरिक परिषद, नेचर एन्वायरमेंट एंड वाइल्ड लाइफ सोसायटी, फिलेटलिक सोसायटी इत्यादी सेंकडो संस्थाएं निः स्वार्थ रूप से सुजानगढ़ में संस्कृति एंव जन सेवार्थ जुटी है ।</p>
<p>सुजानगढ़ का क्षेत्रफल 8.5 वर्ग किलोमीटर व ऊँचाई लगभग 1045 फीट है । सुजानगढ़ की जनसँख्या एक लाख से ऊपर तक पहुंच चुकी है । नगर पालिका कार्य क्षेत्र में तैतीस वार्डो में सुजानगढ़ को बनता गया है राज्य विधानसभा चुनावो हेतु यह आरक्षित सीट है । सुजानगढ़ में दो छवि ग्रह, दो सार्वजनिक पुस्तकालय तीन महाविद्यालय, नो चिकित्सालय (सरकारी व गैर सरकारी), व एक सरकारी अस्पताल है । इसमें नो बैंक समेत कुछ प्राइवेट फाईनेंस कम्पनियाँ भी कार्यरत है ।नगर के अन्दर एक दर्जन के लगभग दर्शनीय स्थल है । सुजानगढ़ में टी.वी. रीले सेन्टर स्थापित है व दूर संचार समेत अन्य संचार माध्यमो की भी व्यवस्था है । आजकल पुराने मकान, हवेलियाँ इत्यादि कम ही नजर आते है, क्योंकि उनके पुन: निर्माण स्वरूप आधुनिक इमारतो का जमा पहना दिया गया है । प्राचीन ऐतिहासिक चिन्ह भग्नावस्था में भी नजर नहीं आते । पुराणी यादो को समेटे हुए खाली एक &#8216;रजा जी की कोठी&#8217; प्राचीन इमारत जर्जर अवस्था में शहर में प्रशासन  की उपेक्षा व लापरवाही से अपने शेष दिन गिन रही है ।</p>
<p>सुजानगढ़ अत्यंत प्रगति पर है । बाहरी क्षेत्रो में आवासीय कोलोनियाँ दिन प्रतिदिन बनती जा रही है । आमतोर पर यह कहा जाता है की कोई सरकारी या गैर सरकारी कर्मचारी एक बार यहाँ आता है तो वापस जाने का नाम नही लेता क्योंकि सुजानगढ़ अत्यंत शांतिप्रिय नगर है । हर क्षेत्र की तरह सुजानगढ़ में भी कुछ सामान्य व असामान्य आभाव -अभियोग , कुछ स्थाई व कुछ अस्थाई आवश्कताएं है । यह कटु सत्य है की संवेदनशीलता व अर्द्ध सरकारी सेवाओं की दयनीय दशा से क्षेत्र में घोर असंतोष पैदा है । विकास एक सापेक्ष मापदंड है पर फिर भी तुलनात्मक दृष्टी से विभिन्न कारणों के कारन सुजानगढ़ क्षेत्र विकास में पीछे ही है । पानी , बिजली , यातायात, चिकत्सा, उधोग इत्यादि प्राथमिक मुलभुत आभावों की पूर्ति क्षेत्र निवासियों को मिलनी ही चाहिए । सुजानगढ़ राजनैतिक दृष्टिकोण से सदा घोर उपेक्षा का शिकार रहा । यहाँ का विकास स्यवंसेवी संस्थाओ, सामाजिक कार्यकर्ताओं एंव  उदारमना दानदाताओं की बदौलत ही संभव हो पता है । राजनैतिक प्रतिनिधियों व सरकारों से तो क्षेत्र के लोगों ने आस ही छोड़ दी है ।</p>
<p>चाहे कुछ भी हो, सुजानगढ़ निःसंदेह राजस्थान प्रदेश में अपनी अलग छवि रखता है । यह एक आलोकिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्क्रतिक, साहित्यिक एंव सांगीतिक पृष्ठभूमि वाला नगर है । राज्य-सरकार यदि थोडा-सा भी ध्यान, देवे तो सुजानगढ़ पर्यटन विकास में अकेला ही काफी बड़ी भागीदारी निभा सकता है ।</p>
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